Wednesday, 6 November 2019

ये ज़िस्म भी वही छुए...

ये ज़िस्म भी वही छुए...


जिस गहराई से उसने मेरे दिल को छू लिया
चाहत बस यही के ये ज़िस्म भी वही छुए।
उसने जब से छुआ है, वो छुअन तो ना साज़ थी
जब छुआ था उसने अहसासों से, तब बंद मेरी आवाज थी
मन मेरा शांत एक भँवर था, अब उसमें तूफान है
कराह उठी थी शब्दों से, मैं भी कैसी नादान थी।
तो क्या जिस गहराई से उसने मेरे दिल को छू लिया
चाहत बस यही के ये ज़िस्म भी वही छुए।

ऐसा तो नहीं उसने छुआ और मैं मैली हो गई
हाँ स्वच्छ थी कोरी सी, थोड़ी सी मटमैली हो गई
हाथों की छुअन से ज्यादा थी, उसके अहसासों की छुअन
और उस छुअन के साथ जीना, मेरे जीवन की शैली हो गई
फिर भी जिस गहराई से उसने मेरे दिल को छू लिया
चाहत बस यही के ये ज़िस्म भी वही छुए।

यहाँ तो उम्र के भी फासले, और दूरियाँ भी हजार हैं
चाहती हूँ बस मैं उसे, वो मुझसे बेज़ार है
उसने तो बस लगाई, मेरा सुलग रहा संसार है
हर जगह से उसने ब्लॉक कर दिया, फिर कैसा पगला मेरा प्यार है
जीने का जब भी सोचूँ, लगे उसके बिना बेकार है
शायद बसा ली हो एक दुनिया, उसने अपनी खुशियों की
तो भी जिस गहराई से उसने मेरे दिल को छू लिया
चाहत बस यही के ये ज़िस्म भी वही छुए।

ऐसा नहीं मैं किसी और की तरफ देखती नहीं
ऐसा भी नहीं कोई पसंद ना आए
ऐसा नहीं किसी पर नज़रें ठहरती नहीं
ऐसा भी नहीं कोई मेरी सोच में आए ना
जब सोचने लगूँ तो उस सा कोई नज़र आए ना 
इसलिए जिस गहराई से उसने मेरे दिल को छू लिया
चाहत बस यही के ये ज़िस्म भी वही छुए।

मैं ऐसा नहीं कहती वो मेरे जीने का सहारा है
ऐसा भी नहीं कि मेरी आँखों का वो तारा है
ऐसा भी नहीं कि मैंने उसके लिए छोड़ा जग सारा है
ऐसा भी नहीं कि उस सा नहीं कोई प्यारा है
बस इतना ही कि कोई लगता नहीं हमारा है
तभी तो जिस गहराई से उसने मेरे दिल को छू लिया
चाहत बस यही के ये ज़िस्म भी वही छुए।

ऐसा नहीं कि मेरी चाहतें अब बदलती नहीं
ऐसा भी नहीं कि मैं अब सजती सँवरती नहीं
ऐसा नहीं कि बस रोती हूँ कभी हँसती नहीं
ऐसा भी नहीं कि मेरे दिल की धड़कनें अब बढ़ती नहीं
जब भी बढ़ती हैं धड़कनें तो याद आता है बस वो
इसलिए जिस गहराई से उसने मेरे दिल को छू लिया
चाहत बस यही के ये ज़िस्म भी वही छुए।

जिस गहराई से उसने छुआ है मुझे नहीं चाहती कोई और छुए
अहसासों से जज्बातों से मेरे दिल में कोई और घुसे
कोई पहरा तो नहीं लगाया है मैंने खुद पर फिर न जानें ए कैसा पहरा है
बस उसकी छुअन हो आखिरी कोई और न मुझको कभी छुए
प्राण हो मेरी शरीर में या निश्चेत हो मेरी सख्शियत
बस वही वो पुरुष हो जो मेरी अस्थियाँ भी चुने
हाँ मैं चाहती हूँ कि जिस गहराई से उसने मेरे दिल को छू लिया
चाहत बस यही के ये ज़िस्म भी वही छुए।।


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